(भैंसदेही/शंकर राय) भैंसदेही क्षेत्र में शराब ठेकेदारों का दबदबा इस कदर बढ़ चुका है कि कानून और व्यवस्था अब उनके लिए महज़ मज़ाक बन गई है। दिनदहाड़े गांव-गांव में अवैध शराब की सप्लाई हो रही है, और चौंकाने वाली बात यह है कि कोई भी जिम्मेदार विभाग इसे रोकने की जहमत तक नहीं उठा रहा।

गाड़ियां भरकर बोतलें पहुंच रही और प्रशासन देख रहा! स्थानीय लोगों के मुताबिक, शराब माफिया बोलरो और अन्य चारपहिया वाहनों में माल भरकर सीधा गांवों तक पहुंचा रहे हैं — बिना किसी वैध लाइसेंस, सुरक्षा व्यवस्था या जांच के। पोखरानी जैसे गांवों में तो यह कारोबार खुलेआम हो रहा है। आम जनता देख रही है, समझ रही है… लेकिन पुलिस और आबकारी विभाग? मानो आंख पर पट्टी बांधकर बैठा हो।

ठेकेदारों की “समानांतर सरकार”
गांव वालों का आरोप है कि शराब ठेकेदार अपने नियम खुद बना रहे हैं, और इन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं। नियम-कायदों को ठेंगा दिखाकर वे अपनी समानांतर व्यवस्था चला रहे हैं, जिसमें पूछताछ या जांच जैसी चीजें बस नाम की रह गई हैं।

ढाबा संचालकों पर दबाव, उल्टा छापे
खबर यह भी है कि अगर कोई ढाबा संचालक या दुकानदार इन शराब माफियाओं का माल लेने से मना कर देता है, तो ठेकेदार खुद आबकारी विभाग को बुलाकर उनके प्रतिष्ठान पर छापा मरवा देते हैं। हैरानी की हद तो तब पार होती है जब कार्रवाई के दौरान ठेकेदार खुद मौके पर मौजूद रहता है — जबकि कानून साफ कहता है कि किसी निजी व्यक्ति की ऐसे मामलों में कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए।

चुप्पी क्यों? मिलीभगत या दबाव?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पुलिस प्रशासन और आबकारी विभाग इस मुद्दे पर मौन क्यों हैं? क्या कहीं कोई सांठगांठ है? या फिर किसी राजनीतिक या आर्थिक दबाव में कार्रवाई टाली जा रही है?

ग्रामीणों में बढ़ता गुस्सा और डर
गांवों में शराब की आसान उपलब्धता ने युवा पीढ़ी को अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया है। नशे की लत के साथ अपराध और सामाजिक विघटन का खतरा भी तेजी से बढ़ रहा है।

अब सवाल जनता का —
क्या भैंसदेही में सचमुच ठेकेदारों की अपनी सरकार चल रही है?
पुलिस और आबकारी विभाग आखिर किसके इशारे पर खामोश हैं?
क्या प्रशासन केवल किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा?

अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह स्थिति सिर्फ कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि समाज के भविष्य के लिए भी विस्फोटक साबित हो सकती है।


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