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हमारे पास स्वर्ग है, लेकिन प्रतिनिधि नहीं बैतूल के पर्यटन स्थलों को निगल गई जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता कुकरू खामला, मुक्तागिरी और शिव मंदिर उपेक्षा की भेंट।

(भैंसदेही शंकर राय) सतपुड़ा की रानी कहलाने वाला बैतूल जिला आज भी अपनी पहचान और पर्यटन संभावनाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। घने जंगल, पहाड़, धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरें होने के बावजूद बैतूल विकास की दौड़ में पीछे है। इसकी सबसे बड़ी वजह हमारे क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की घोर उदासीनता और आत्म केंद्रित राजनीतिक एजेंडा है।
आदिवासी क्षेत्रों से जुड़े इन क्षेत्रों पर हमारे जिले के आदिवासी सांसद और आदिवासी विधायक होने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। विकास के नाम पर सिर्फ पोस्टर, बैनर और निजी रसूख तक सीमित रह गया है।
आज तक नहीं उठी उत्थान की मांग
भैंसदेही क्षेत्र में मौजूद ऐसे तीन महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल हैं, जो अगर सही दिशा और सरकारी इच्छाशक्ति पा जाएं तो पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल सकते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इन स्थलों को लेकर न तो सांसद गंभीर हैं, न विधायक और न ही स्थानीय जनप्रतिनिधि कभी अपने बड़े नेताओं से इन मुद्दों को उठाने की हिम्मत करते हैं।
प्रकृति जोड़ रही है उत्थान की बाट
भैंसदेही क्षेत्र का कुकरु खामला प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है, लेकिन आज तक इसे आधिकारिक पर्यटन स्थल का दर्जा नहीं मिल पाया। यहां पहुंचने वाले पर्यटक सुविधाओं के अभाव में निराश होकर लौट जाते हैं। न सड़क, न सुरक्षा, न शौचालय ओर नहीं भोजन पानी न बैठने की व्यवस्था। सवाल यह है कि क्या सांसद और विधायक कभी यहां झांकने भी आए? जवाब साफ है—न आए, न सोचने की जरूरत समझी।
हमारी जमीन पर दूसरे राज्य उठा रहे लाभ
मुकागिरी जैन तीर्थ स्थल मध्यप्रदेश-महाराष्ट्र सीमा पर स्थित है। और इस पर्यटन स्थल का दर्जा तो दिया गया है लेकिन पहाड़ों के बीच बसे इस दिव्य स्थल में 52 जैन मंदिर हैं और यह भैंसदेही विधानसभा, बैतूल जिले में आता है। इसके बावजूद इस तीर्थ का संचालन और पहचान महाराष्ट्र को मिल रही है। अगर हमारे सांसद और विधायक चाहें, तो मुकागिरी बैतूल का अंतरराष्ट्रीय पर्यटन ब्रांड बन सकता है। लेकिन अफसोस किसी जनप्रतिनिधि ने आज तक इसे जिले के हक का मुद्दा नहीं बनाया।
13वीं सदी का खत्म हो रहा शिव मंदिर
भैंसदेही नगर में स्थित 13वीं शताब्दी का प्राचीन शिव मंदिर आज बदहाली का शिकार है। पुरातत्व विभाग के अधीन होने के बावजूद संरक्षण के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति हो रही है। अगर सांसद और विधायक चाहें, तो यहां छोटा शिवलोक विकसित हो सकता है, जिससे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिले। लेकिन सच्चाई यह है कि जनप्रतिनिधियों को इतिहास बचाने से ज्यादा अपना भविष्य चमकाने की चिंता है।
क्या कर रहे हैं आखिर जनप्रतिनिधि?
बैतूल जिले के लिए यह विशेष अवसर है कि केंद्र में राज्य मंत्री दुर्गादास उईके, प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल जैसे ताकतवर पदों पर जिले के नेता बैठे हैं और भैंसदेही से चार बार के विधायक महेंद्र सिंह चौहान प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि न सांसद ने इन पर्यटन स्थलों को संसद में मजबूती से उठाया और न विधायक ने विधानसभा में इसे प्राथमिक मुद्दा बनाया। न ही स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने कभी दबाव बनाने की कोशिश की। सब चुप हैं क्योंकि चुप्पी में ही उनका निजी विकास सुरक्षित है।

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